SEBI का बड़ा फैसला: क्या वीकली एक्सपायरी खत्म होने से BSE-NSE पर पड़ेगा सबसे बड़ा झटका?
शेयर बाजार में इस वक्त हर ट्रेडर, इन्वेस्टर और एनालिस्ट की ज़ुबान पर एक ही सवाल है —
क्या सेबी (SEBI) वाकई वीकली एक्सपायरी खत्म करने जा रही है?
और अगर ऐसा हुआ, तो इसका असर सिर्फ़ ट्रेडर्स तक सीमित रहेगा या पूरे मार्केट के ढांचे को हिला देगा?
दरअसल, पिछले कुछ सालों में भारत का शेयर बाजार धीरे-धीरे “ट्रेडिंग-ड्रिवन मार्केट” बन गया है। पहले जहां निवेशक लंबी अवधि के निवेश (Long-term Investment) पर ध्यान देते थे, वहीं अब रोज़ाना या हफ्तेवार ट्रेडिंग करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है, खासकर F&O यानी Futures and Options में।
सेबी को अब यही चिंता सता रही है — क्योंकि बीते एक साल में रिटेल निवेशकों के लाखों रुपये सिर्फ़ F&O ट्रेडिंग में गंवाए गए हैं। इसलिए अब रेगुलेटर का मकसद साफ़ है: ट्रेडिंग की आग को थोड़ा ठंडा करना।
शुरुआत: कैसे ट्रेडिंग ने बाजार की धड़कन बदल दी
पिछले कुछ महीनों में सेबी ने कई बड़े कदम उठाए हैं।
पहले STT (Securities Transaction Tax) बढ़ाया गया,
फिर ज़ीरो ब्रोकरेज मॉडल पर सवाल उठाए गए,
और अब निशाने पर हैं खुद BSE और NSE जैसे बड़े एक्सचेंज।
यह कदम इतना बड़ा है कि इसे बाजार के बेसिक ढांचे में बदलाव कहा जा सकता है।
क्योंकि अगर वीकली एक्सपायरी (Weekly Expiry) खत्म हो जाती है,
तो पूरा ट्रेडिंग इकोसिस्टम एक नई दिशा में चला जाएगा।
BSE और NSE का बिज़नेस मॉडल: स्टेडियम का गणित
अगर आप समझना चाहते हैं कि वीकली एक्सपायरी हटने से एक्सचेंजेस पर इतना असर क्यों पड़ेगा,
तो एक आसान उदाहरण लीजिए — क्रिकेट स्टेडियम का।
BSE और NSE को समझिए जैसे मैच करवाने वाले स्टेडियम।
ट्रेडर्स यानी खिलाड़ी रोज़ यहां आते हैं, खेलते हैं, दांव लगाते हैं,
और हर हफ्ते “एक्सपायरी डे” पर बड़ी हलचल मचती है।
अब स्टेडियम के मालिक को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि
खिलाड़ी जीतते हैं या हारते हैं।
उसे फर्क पड़ता है सिर्फ़ एक बात से —
मैच हुए या नहीं, और कितने लोग टिकट लेकर आए।
यानी जितने ज़्यादा मैच (ट्रेडिंग दिन या एक्सपायरी),
उतनी ज़्यादा कमाई।
अभी साल में करीब 52 एक्सपायरियाँ होती हैं,
जो एक्सचेंज की कमाई का बड़ा हिस्सा हैं।
अगर वीकली एक्सपायरी खत्म हुई और सिर्फ मंथली रह गई,
तो साल में सिर्फ़ 12 एक्सपायरियाँ बचेंगी।
अब सोचिए, अगर IPL में हर टीम को सिर्फ़ एक मैच खेलने दिया जाए,
तो स्टेडियम मालिक का क्या हाल होगा?
कुछ वैसा ही असर एक्सचेंजेस पर भी पड़ेगा।
खतरा: अगर वीकली एक्सपायरी हटी तो क्या होगा?
सेबी इस समय F&O से जुड़े भारी वॉल्यूम और रिटेल नुकसान को देखते हुए
वीकली एक्सपायरी खत्म करने पर गंभीरता से विचार कर रही है।
अगर ऐसा होता है, तो इसके सीधे नतीजे होंगे:
- ट्रेडिंग वॉल्यूम घटेगा — कम एक्सपायरी का मतलब कम एक्टिविटी।
- एक्सचेंजेस की कमाई पर असर पड़ेगा — उनकी आय वॉल्यूम पर निर्भर करती है।
- मार्केट की लिक्विडिटी कम होगी — जब ट्रेडिंग घटती है, तो पैसा भी कम घूमता है।
- शेयरों पर दबाव बढ़ेगा — BSE का शेयर पहले ही लगभग 30% गिर चुका है।
यानी यह कोई छोटा बदलाव नहीं होगा।
अगर सेबी का फैसला लागू होता है, तो मार्केट की रफ्तार ही बदल जाएगी।
जेफ़रीज़ की चेतावनी: चार संभावित खतरे
इंटरनेशनल ब्रोकरेज फर्म Jefferies ने इस संभावित बदलाव पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अगर वीकली एक्सपायरी खत्म होती है,
तो BSE की प्रॉफिटेबिलिटी 21% से लेकर 50% तक घट सकती है।
| संभावित स्थिति | एक्सपायरी पैटर्न | BSE के मुनाफे पर असर |
|---|---|---|
| 1. बेस्ट केस | फोर्टनाइटली (हर 2 हफ्ते में), अलग-अलग दिन | 21% गिरावट |
| 2. खराब केस | फोर्टनाइटली, लेकिन NSE के साथ एक ही दिन | 35% गिरावट |
| 3. बहुत खराब केस | मंथली, अलग-अलग दिन | 41% गिरावट |
| 4. सबसे वर्स्ट केस | मंथली, एक ही दिन | 50% गिरावट |
यानि चाहे जो भी स्थिति बने, नुकसान तय है —
फर्क सिर्फ़ इतना है कि कितना गहरा होगा।
निवेशकों और ब्लॉग रीडर्स के लिए सीख
इस पूरे विवाद से एक बात बहुत साफ निकलती है —
बाजार इस वक्त असंतुलन की स्थिति में है।
जब तक सेबी का अंतिम फैसला नहीं आता,
BSE जैसे स्टॉक्स पर दबाव बना रहेगा।
अगर आप निवेशक हैं,
तो जल्दबाज़ी में कोई कदम उठाने से बचिए।
रेगुलेटरी बदलाव हमेशा शुरुआती दौर में नकारात्मक लगते हैं,
लेकिन लंबे समय में बाजार खुद को एडजस्ट कर लेता है।
आपका फोकस कंपनी की मूल ताकत, बिज़नेस क्वालिटी
और दीर्घकालिक ग्रोथ पर होना चाहिए —
न कि सिर्फ़ अफवाहों और हेडलाइनों पर।
आगे क्या?
अगर वीकली एक्सपायरी खत्म होती है,
तो भारतीय बाजार की ट्रेडिंग कल्चर ही बदल सकती है।
कई एक्टिव ट्रेडर्स मार्केट से बाहर निकल सकते हैं,
वॉल्यूम घट सकता है, और वोलैटिलिटी कम हो सकती है।
लेकिन इसका सकारात्मक पक्ष भी है।
रिटेल निवेशकों को बार-बार के नुकसान से राहत मिलेगी।
सेबी का उद्देश्य यही है —
ट्रेडिंग के नाम पर हो रही सट्टेबाज़ी को सीमित करना
और निवेश को स्थिरता की दिशा में ले जाना।
निष्कर्ष: बाजार को क्या चाहिए — रफ्तार या स्थिरता?
अब सवाल यही है —
क्या सेबी को वीकली एक्सपायरी वाकई खत्म कर देनी चाहिए
ताकि रिटेल निवेशक सुरक्षित रहें?
या फिर यह फैसला बाजार की ऊर्जा और लिक्विडिटी को खत्म कर देगा?
आखिरकार, यह फैसला बाजार के भविष्य की दिशा तय करेगा।
रफ्तार भी ज़रूरी है, लेकिन स्थिरता के बिना वह टिक नहीं सकती।
अगले कुछ हफ्ते तय करेंगे कि बाजार किस रास्ते पर जाएगा।
